श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 37: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  5.37.47 
न तथेच्छन्ति कल्याणान् परेषां वेदितुं गुणान्।
यथैषां ज्ञातुमिच्छन्ति नैर्गुण्यं पापचेतस:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
जिनके मन पापों में लगे रहते हैं, वे दूसरों के शुभ गुणों को जानने की उतनी इच्छा नहीं करते, जितनी उनके अवगुणों को जानने की इच्छा रखते हैं ॥47॥
 
Those whose minds are engaged in sins do not desire to know the auspicious qualities of others as much as they desire to know their demerits. ॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)