श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 37: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  5.37.41 
वृद्धि: प्रभावस्तेजश्च सत्त्वमुत्थानमेव च।
व्यवसायश्च यस्य स्यात् तस्यावृत्तिभयं कुत:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
जिसके पास बढ़ने की शक्ति, प्रभाव, तेज, साहस, उद्योग और (अपने कर्तव्य में) दृढ़ता है, उसे अपनी आजीविका के नष्ट होने का भय कैसे हो सकता है?॥ 41॥
 
How can one who has the power to grow, influence, brilliance, courage, industry and determination (in his duty) fear the destruction of his livelihood?॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)