श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 37: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  5.37.36 
कदर्यमाक्रोशकमश्रुतं च
वनौकसं धूर्तममान्यमानिनम्।
निष्ठूरिणं कृतवैरं कृतघ्न-
मेतान् भृशार्तोऽपि न जातु याचेत्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
यदि मनुष्य अत्यन्त दुःखी हो, तो भी उसे कंजूस, अपशब्द बोलने वाले, मूर्ख, वनवासी, धूर्त, नीच सेवक, क्रूर, शत्रु या कृतघ्न व्यक्ति से सहायता नहीं मांगनी चाहिए ॥36॥
 
Even if one is very distressed, one should never ask for help from a miser, a foul-mouthed person, a fool, a forest-dweller, a sly person, a lowly servant, a cruel person, an enemy or an ungrateful person. ॥36॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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