श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 37: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  5.37.22 
यस्तात न क्रुध्यति सर्वकालं
भृत्यस्य भक्तस्य हिते रतस्य।
तस्मिन् भृत्या भर्तरि विश्वसन्ति
न चैनमापत्सु परित्यजन्ति॥ २२॥
 
 
अनुवाद
पिता जी! जो स्वामी अपने उस भक्त सेवक पर कभी क्रोध नहीं करता, जो सदैव उसके हित में लगा रहता है, जो अपने सेवकों का विश्वासपात्र होता है और संकट के समय भी उसका साथ नहीं छोड़ता ॥22॥
 
Father! A master who never gets angry with his devoted servant who is always engaged in doing good for them, is trusted by his servants and is never deserted even in times of trouble. ॥22॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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