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mahabharat 5.37.16: जो मनुष्य धर्म का आश्रय लेकर इस बात की परवाह न करके कि वह व्यक्ति अपने स्वामी को प्रिय होगा या अप्रिय, हितकर वचन बोलता है, चाहे वह उसे अप्रिय भी क्यों न लगे, वही सत्य से राजा की सहायता करता है ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 5.37: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 37: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  5.37.16 
यो हि धर्मं समाश्रित्य हित्वा भर्तु: प्रियाप्रिये।
अप्रियाण्याह पथ्यानि तेन राजा सहायवान्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य धर्म का आश्रय लेकर इस बात की परवाह न करके कि वह व्यक्ति अपने स्वामी को प्रिय होगा या अप्रिय, हितकर वचन बोलता है, चाहे वह उसे अप्रिय भी क्यों न लगे, वही सत्य से राजा की सहायता करता है ॥16॥
 
He who, taking recourse to Dharma and ignoring whether the person will be liked or disliked by his master, speaks what is beneficial even if it is not liked by him, only he helps the king in truth. ॥16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)