श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 37: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  5.37.12-13 
विश्वस्तस्यैति यो दारान् यश्चापि गुरुतल्पग:।
वृषलीपतिर्द्विजो यश्च पानपश्चैव भारत॥ १२॥
आदेशकृद् वृत्तिहन्ता द्विजानां प्रेषकश्च य:।
शरणागतहा चैव सर्वे ब्रह्महण: समा:।
एतै: समेत्य कर्तव्यं प्रायश्चित्तमिति श्रुति:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
भारत! जो अपने पर विश्वास रखने वाले पुरुष की पत्नी के साथ समागम करता है, जो अपने गुरु की पत्नी के पीछे जाता है, जो ब्राह्मण होकर शूद्र स्त्री से विवाह करता है, जो मद्यपान करता है, जो ब्राह्मणों को आदेश देता है, जो उनकी जीविका नष्ट करता है, जो ब्राह्मणों को सेवा के लिए इधर-उधर भेजता है और जो शरणागतों पर हिंसा करता है - ये सब ब्रह्महत्यारे के समान हैं। इनका संग करके मनुष्य को तप करना चाहिए - यही वेद का आदेश है॥12-13॥
 
Bharat! He who has intercourse with the wife of a man who trusts himself, he who goes after the wife of his Guru, who being a Brahmin marries a Shudra woman, who drinks alcohol and he who issues orders to Brahmins, who ruins their livelihood, who sends Brahmins here and there for service and who commits violence against those who have taken refuge - all of these are like killers of a Brahman. One should do penance after associating with them - this is the order of the Vedas.॥12-13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)