श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 37: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  5.37.10-11 
विदुर उवाच
अतिमानोऽतिवादश्च तथात्यागो नराधिप।
क्रोधश्चात्मविधित्सा च मित्रद्रोहश्च तानि षट्॥ १०॥
एत एवासयस्तीक्ष्णा कृन्तन्त्यायूंषि देहिनाम्।
एतानि मानवान् घ्नन्ति न मृत्युर्भद्रमस्तु ते॥ ११॥
 
 
अनुवाद
विदुर जी बोले- हे राजन! आपका कल्याण हो। अत्यधिक अभिमान, अत्यधिक वाचालता, त्याग का अभाव, क्रोध, जीविकोपार्जन की चिन्ता और मित्रों से विश्वासघात- ये छः तीक्ष्ण तलवारें मनुष्यों का जीवन छोटा कर देती हैं। ये ही मनुष्यों को मारती हैं, मृत्यु का कारण नहीं बनतीं॥10-11॥
 
Vidur ji said- O King! May you be blessed. Excessive pride, excessive talkativeness, lack of renunciation, anger, worry about earning one's own living and betrayal of friends-these six sharp swords cut short the life of mortals. These are the ones that kill humans, not cause death.॥ 10-11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)