श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 37: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  5.37.1-2 
विदुर उवाच
सप्तदशेमान् राजेन्द्र मनु: स्वायम्भुवोऽब्रवीत्।
वैचित्रवीर्य पुरुषानाकाशं मुष्टिभिर्घ्नत:॥ १॥
दानवेन्द्रस्य च धनुरनाम्यं नमतोऽब्रवीत्।
अथो मरीचिन: पादानग्राह्यान् गृह्णतस्तथा॥ २॥
 
 
अनुवाद
विदुर जी कहते हैं - राजेन्द्र! हे विचित्रवीर्यपुत्र! स्वायम्भुव मनु ने आकाश को भेदने वाले, न मोड़े जा सकने वाले, वर्षा ऋतु में इन्द्रधनुष को मोड़ने का प्रयत्न करने वाले और न पकड़ी जा सकने वाली सूर्य की किरणों को पकड़ने का प्रयत्न करने वाले (अर्थात् उनके सारे प्रयत्न व्यर्थ कहे गए हैं) - ये सत्रह प्रकार के पुरुष बताए हैं। ॥1-2॥
 
Vidur ji says - Rajendra! O son of Vichitravirya! Swayambhuva Manu has described these seventeen types of men as those who punch the sky, those who cannot be bent, those who try to bend the rainbow during the rainy season and those who try to catch the rays of the sun which cannot be caught (that is, all their efforts have been called futile). ॥1-2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas