श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 36: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.36.6 
नाक्रोशी स्यान्नावमानी परस्य
मित्रद्रोही नोत नीचोपसेवी।
न चाभिमानी न च हीनवृत्तो
रूक्षां वाचं रुषतीं वर्जयीत॥ ६॥
 
 
अनुवाद
दूसरों को गाली या अपमान न दे, मित्रों से विश्वासघात न करे, नीच लोगों की सेवा न करे, अभिमान न करे, सदाचार से रहित न हो; कठोर और क्रोधपूर्ण वाणी का त्याग कर दे ॥6॥
 
Do not abuse or insult others, do not betray friends or serve lowly people, do not be arrogant or lack good conduct; give up harsh and angry speech. ॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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