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श्लोक  5.36.51 
विदुर उवाच
नान्यत्र विद्यातपसोर्नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहात्।
नान्यत्र लोभसंत्यागाच्छान्तिं पश्यामि तेऽनघ॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
विदुर जी बोले - हे निष्पाप राजन! मैं तुम्हें शांति दिलाने के लिए ज्ञान, तप, इन्द्रिय संयम और लोभ के त्याग के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं देखता।
 
Vidur ji said - O sinless king! I do not see any other way to bring peace to you except knowledge, penance, control of senses and renunciation of greed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)