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mahabharat 5.36.48: ये छहों इन्द्रियाँ बड़ी चंचल हैं; जो भी इन्द्रिय जिस विषय की ओर जाती है, वहाँ बुद्धि क्षीण हो जाती है, जैसे फूटे हुए घड़े से जल सदैव रिसता रहता है ॥48॥   |   mahabharat अध्याय 5.36: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 36: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  5.36.48 
चलानि हीमानि षडिन्द्रियाणि
तेषां यद् यद् वर्धते यत्र यत्र।
ततस्तत: स्रवते बुद्धिरस्य
छिद्रोदकुम्भादिव नित्यमम्भ:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
ये छहों इन्द्रियाँ बड़ी चंचल हैं; जो भी इन्द्रिय जिस विषय की ओर जाती है, वहाँ बुद्धि क्षीण हो जाती है, जैसे फूटे हुए घड़े से जल सदैव रिसता रहता है ॥48॥
 
These six senses are very fickle; whichever sense moves towards whichever object, the intellect gets weakened there, just like water always leaks from a broken pot. ॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)