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mahabharat 5.36.45: शोक करने से अभीष्ट वस्तु प्राप्त नहीं होती; उससे केवल शरीर को कष्ट होता है और शत्रु प्रसन्न होते हैं। अतः मन में शोक मत करो ॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 5.36: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 36: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  5.36.45 
अनवाप्यं च शोकेन शरीरं चोपतप्यते।
अमित्राश्च प्रहृष्यन्ति मा स्म शोके मन: कृथा:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
शोक करने से अभीष्ट वस्तु प्राप्त नहीं होती; उससे केवल शरीर को कष्ट होता है और शत्रु प्रसन्न होते हैं। अतः मन में शोक मत करो ॥ 45॥
 
The desired object is not achieved by mourning; it only torments the body and pleases the enemies. Therefore, do not mourn in your mind. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)