श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 36: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  5.36.30 
वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्तत: क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हत:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
शील की रक्षा सावधानी से करनी चाहिए; धन तो आता-जाता रहता है। धन क्षीण हो जाए तो भी पुण्यात्मा पुरुष क्षीण नहीं माना जाता; किन्तु जिसने अपना शील भ्रष्ट कर लिया है, उसे नष्ट ही माना जाना चाहिए ॥30॥
 
One should protect moral conduct with care; wealth comes and goes. Even if wealth diminishes, a virtuous man is not considered diminished; but one who has corrupted his moral conduct should be considered destroyed. ॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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