श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 36: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  5.36.15 
न जीयते चानुजिगीषतेऽन्यान्
न वैरकृच्चाप्रतिघातकश्च।
निन्दाप्रशंसासु समस्वभावो
न शोचते हृष्यति नैव चायम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जो न तो किसी से जीता जाना चाहता है, न दूसरों को जीतना चाहता है, जो न किसी से बैर रखता है, न दूसरों को दुःख पहुँचाना चाहता है, जो स्तुति और निन्दा से उदासीन रहता है, वह हर्ष और शोक से परे है ॥15॥
 
He who neither wants to be conquered by anyone nor wishes to conquer others, who neither bears enmity towards anyone nor wishes to hurt others, who remains indifferent to praise and criticism, he is beyond joy and sorrow. ॥15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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