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mahabharat 5.36.13: मनुष्य जैसा बनना चाहता है, जैसा चाहता है, जैसा चाहता है, जैसा चाहता है, जैसा चाहता है, वैसा ही बन जाता है, जैसे लोगों के साथ रहता है, जैसी सेवा करता है, और जो कुछ बनना चाहता है, वैसा ही बन जाता है ॥13॥   |   mahabharat अध्याय 5.36: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.36.13 
यादृशै: संनिविशते यादृशांश्चोपसेवते।
यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग् भवति पूरुष:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य जैसा बनना चाहता है, जैसा चाहता है, जैसा चाहता है, जैसा चाहता है, जैसा चाहता है, वैसा ही बन जाता है, जैसे लोगों के साथ रहता है, जैसी सेवा करता है, और जो कुछ बनना चाहता है, वैसा ही बन जाता है ॥13॥
 
A man becomes what he wants to be, what kind of people he lives with, what kind of people he serves, and whatever he wants to be. ॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)