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mahabharat 5.35.68: प्रथम अवस्था में ऐसा कर्म करना चाहिए जिससे वृद्धावस्था में सुखपूर्वक जीवनयापन हो सके और जीवनपर्यन्त ऐसा कर्म करना चाहिए जिससे मृत्यु के बाद भी (परलोक में) सुखपूर्वक जीवनयापन हो सके ॥68॥   |   mahabharat अध्याय 5.35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश  »  श्लोक 68
 
 
श्लोक  5.35.68 
पूर्वे वयसि तत् कुर्याद् येन वृद्ध: सुखं वसेत्।
यावज्जीवेन तत् कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत्॥ ६८॥
 
 
अनुवाद
प्रथम अवस्था में ऐसा कर्म करना चाहिए जिससे वृद्धावस्था में सुखपूर्वक जीवनयापन हो सके और जीवनपर्यन्त ऐसा कर्म करना चाहिए जिससे मृत्यु के बाद भी (परलोक में) सुखपूर्वक जीवनयापन हो सके ॥68॥
 
In the first stage one should perform such work which will enable one to live comfortably in old age, and throughout life one should perform such work which will enable one to live happily even after death (in the next world). ॥ 68॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)