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श्री महाभारत
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पर्व 5: उद्योग पर्व
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अध्याय 35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश
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श्लोक 65
श्लोक
5.35.65
अनसूयु: कृतप्रज्ञ: शोभनान्याचरन् सदा।
न कृच्छ्रं महदाप्नोति सर्वत्र च विरोचते॥ ६५॥
अनुवाद
शुद्ध मन वाला, बुरे विचारों से रहित, सदैव अच्छे कर्म करने वाला पुरुष महान सुख प्राप्त करता है और सर्वत्र सम्मान पाता है ॥65॥
A man with a pure mind and free from evil thoughts, always performing good deeds, attains great happiness and is respected everywhere. 65॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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