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mahabharat 5.35.60: जो निंदित मनुष्य अपने पापों के लिए प्रसिद्ध है, वह पाप कर्म करता हुआ भी अपने पापों का ही फल पाता है और जो पुण्यों के लिए प्रसिद्ध (प्रशंसित) है, वह शुभ कर्म करता हुआ भी महान पुण्य का ही फल भोगता है ॥60॥   |   mahabharat अध्याय 5.35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  5.35.60 
पापं कुर्वन् पापकीर्ति: पापमेवाश्नुते फलम्।
पुण्यं कुर्वन् पुण्यकीर्ति: पुण्यमत्यन्तमश्नुते॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
जो निंदित मनुष्य अपने पापों के लिए प्रसिद्ध है, वह पाप कर्म करता हुआ भी अपने पापों का ही फल पाता है और जो पुण्यों के लिए प्रसिद्ध (प्रशंसित) है, वह शुभ कर्म करता हुआ भी महान पुण्य का ही फल भोगता है ॥60॥
 
A condemned person, who is famous for his sins, while committing sinful acts, gets only the fruits of his sins, and a person who is famous for his virtues (admired), while doing good deeds, enjoys only the fruits of great virtue. 60॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)