श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  5.35.51 
श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भ्यात् सम्प्रवर्धते।
दाक्ष्यात् तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठति॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मी शुभ कर्मों से उत्पन्न होती है, वाक्पटुता से बढ़ती है, चतुराई से जड़ पकड़ती है और संयम से सुरक्षित रहती है ॥51॥
 
Lakshmi is born from good deeds, grows with eloquence, takes root with cleverness and is protected by self-restraint. ॥ 51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)