श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  5.35.42 
नैनं छन्दांसि वृजिनात् तारयन्ति
मायाविनं मायया वर्तमानम्।
नीडं शकुन्ता इव जातपक्षा-
श्छन्दांस्येनं प्रजहत्यन्तकाले॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
वेद छल करने वाले को उसके पापों से मुक्त नहीं करते; परन्तु जैसे पक्षी के बच्चे पंख निकल आने पर अपना घोंसला छोड़ देते हैं, वैसे ही वेद भी उसके जीवन के अंत में उसे त्याग देते हैं ॥ 42॥
 
The Vedas do not absolve a deceiver of his sins; but just as the young birds leave their nest after they have grown wings, so too the Vedas forsake him at the end of his life. ॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)