श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 35: विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  5.35.37 
सुधन्वोवाच
यद् धर्ममवृणीथास्त्वं न कामादनृतं वदी:।
पुनर्ददामि ते पुत्रं तस्मात् प्रह्राद दुर्लभम्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
सुधन्वा ने कहा - प्रह्लाद! तुमने धर्म को स्वीकार किया है और स्वार्थवश झूठ नहीं बोला है; इसलिए मैं तुम्हें यह दुर्लभ पुत्र पुनः दे रहा हूँ।
 
Sudhanva said - Prahlada! You have accepted Dharma and have not told a lie out of selfishness; therefore I am giving you this rare son again.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)