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श्लोक 5.34.86  |
अनुक्रोशादानृशंस्याद् योऽसौ धर्मभृतां वर:।
गौरवात् तव राजेन्द्र बहून् क्लेशांस्तितिक्षति॥ ८६॥ |
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| अनुवाद |
| राजन! धर्म के अनुयायियों में श्रेष्ठ युधिष्ठिर आपके प्रति अपनी दया, मृदुता और अभिमान के कारण महान कष्ट सह रहे हैं। |
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| King! Yudhishthira, the best of all the followers of Dharma, is enduring a lot of trouble due to his compassion, mildness and pride towards you. |
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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरनीतिवाक्ये चतुस्त्रिंशोऽध्याय:॥ ३४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत प्रजागरपर्वमें विदुर-नीतिवाक्यविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४॥
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