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श्लोक 5.34.80  |
वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति
यैराहत: शोचति रात्र्यहानि।
परस्य नामर्मसु ते पतन्ति
तान् पण्डितो नावसृजेत् परेभ्य:॥ ८०॥ |
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| अनुवाद |
| कठोर वचन बाण के समान हैं जो मुख से निकलकर दूसरों के मर्मस्थल पर लगते हैं; उनसे पीड़ित व्यक्ति दिन-रात दुःख भोगता रहता है। अतः विद्वान पुरुष को चाहिए कि उनका प्रयोग दूसरों पर न करे ॥80॥ |
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| Harsh words are like arrows that come out of one's mouth and strike at the vital points of others; the person hurt by them keeps on suffering day and night. Therefore, a learned person should not use them on others. ॥ 80॥ |
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