श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 34: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  5.34.80 
वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति
यैराहत: शोचति रात्र्यहानि।
परस्य नामर्मसु ते पतन्ति
तान् पण्डितो नावसृजेत् परेभ्य:॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
कठोर वचन बाण के समान हैं जो मुख से निकलकर दूसरों के मर्मस्थल पर लगते हैं; उनसे पीड़ित व्यक्ति दिन-रात दुःख भोगता रहता है। अतः विद्वान पुरुष को चाहिए कि उनका प्रयोग दूसरों पर न करे ॥80॥
 
Harsh words are like arrows that come out of one's mouth and strike at the vital points of others; the person hurt by them keeps on suffering day and night. Therefore, a learned person should not use them on others. ॥ 80॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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