श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 34: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  5.34.71 
निजानुत्पतत: शत्रून् पञ्च पञ्चप्रयोजनान्।
यो मोहान्न निगृह्णाति तमापद् ग्रसते नरम्॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अपनी पाँच इन्द्रियरूपी शत्रुओं को, जो आसक्ति के कारण पाँच विषयों की ओर दौड़ते हैं, वश में नहीं करता, उस पर विपत्ति छा जाती है ॥ 71॥
 
A calamity engulfs the man who does not control his five sense-like enemies who run towards the five objects due to attachment. ॥ 71॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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