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mahabharat 5.34.70: दुष्ट और पापी लोगों का त्याग न करने और उनकी संगति करने से निर्दोष सज्जन भी उनके (पापियों के) समान दण्ड पाते हैं, जैसे गीली लकड़ी सूखी लकड़ी के संपर्क में आने पर जल जाती है; इसलिए दुष्ट पुरुषों की संगति कभी न करें। 70.   |   mahabharat अध्याय 5.34: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 34: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  5.34.70 
असंत्यागात् पापकृतामपापां-
स्तुल्यो दण्ड: स्पृशते मिश्रभावात्।
शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावात्
तस्मात् पापै: सह सन्धिं न कुर्यात्॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
दुष्ट और पापी लोगों का त्याग न करने और उनकी संगति करने से निर्दोष सज्जन भी उनके (पापियों के) समान दण्ड पाते हैं, जैसे गीली लकड़ी सूखी लकड़ी के संपर्क में आने पर जल जाती है; इसलिए दुष्ट पुरुषों की संगति कभी न करें। 70.
 
By not abandoning the wicked and sinful people and by associating with them, even the innocent gentlemen receive the same punishment as them (sinners), just as a wet wood burns when it comes in contact with dry wood; therefore, never associate with wicked men. 70.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)