श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 34: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  5.34.59 
रथ: शरीरं पुरुषस्य राज-
न्नात्मा नियन्तेन्द्रियाण्यस्य चाश्वा:।
तैरप्रमत्त: कुशली सदश्वै-
र्दान्तै: सुखं याति रथीव धीर:॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
राजन! मनुष्य का शरीर रथ है, बुद्धि सारथि है और इन्द्रियाँ उसके घोड़े हैं। इन्हें वश में करके, सावधान रहने वाला चतुर और धैर्यवान मनुष्य, वश में किए हुए घोड़ों वाले सारथि के समान सुखपूर्वक संसार रूपी मार्ग को पार कर जाता है। 59॥
 
Rajan! Man's body is the chariot, intellect is the charioteer and senses are its horses. Having controlled them, a clever and patient person who is careful, crosses the path of the world happily like a charioteer with controlled horses. 59॥
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