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धर्मेण राज्यं विन्देत धर्मेण परिपालयेत्।
धर्ममूलां श्रियं प्राप्य न जहाति न हीयते॥ ३१॥
अनुवाद
मनुष्य को चाहिए कि वह धर्म के आधार पर राज्य प्राप्त करे और धर्म के आधार पर ही उसकी रक्षा करे, क्योंकि धर्म पर आधारित राज्य की संपत्ति पाकर न तो राजा उसे त्यागता है और न ही वह राजा को त्यागती है।
One should acquire the kingdom by virtue of Dharma and protect it by virtue of Dharma, because after getting the wealth of the kingdom which is based on Dharma, neither the king abandons it nor does it abandon the king.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥