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श्लोक 5.34.30  |
य एव यत्न: क्रियते परराष्ट्रविमर्दने।
स एव यत्न: कर्तव्य: स्वराष्ट्रपरिपालने॥ ३०॥ |
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| अनुवाद |
| जिस प्रकार अन्य राष्ट्रों को नष्ट करने के लिए प्रयत्न किया जाता है, उसी प्रकार अपने राज्य की रक्षा के लिए भी तत्परता दिखानी चाहिए ॥30॥ |
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| The same kind of effort that is made to destroy other nations, the same readiness should be shown to protect one's own kingdom. ॥ 30॥ |
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