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mahabharat 5.34.3: विद्वान्! मेरे मन में सदैव अनिष्ट का भय बना रहता है, इसलिए मुझे सर्वत्र अनिष्ट ही दिखाई देता है। अतः मैं व्याकुल मन से आपसे पूछ रहा हूँ- अजातशत्रु युधिष्ठिर क्या चाहते हैं, मुझे सब कुछ विस्तारपूर्वक बताइए।   |   mahabharat अध्याय 5.34: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.34.3 
पापाशङ्की पापमेवानुपश्यन्
पृच्छामि त्वां व्याकुलेनात्मनाहम्।
कवे तन्मे ब्रूहि सर्वं यथाव-
न्मनीषितं सर्वमजातशत्रो:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
विद्वान्! मेरे मन में सदैव अनिष्ट का भय बना रहता है, इसलिए मुझे सर्वत्र अनिष्ट ही दिखाई देता है। अतः मैं व्याकुल मन से आपसे पूछ रहा हूँ- अजातशत्रु युधिष्ठिर क्या चाहते हैं, मुझे सब कुछ विस्तारपूर्वक बताइए।
 
Scholar! The fear of evil always remains in my mind, therefore I see evil everywhere. Therefore with a restless heart I am asking you- what does Ajatashatru Yudhishthira want, tell me everything in detail.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)