श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 34: धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.34.14 
यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत्।
हितं च परिणामे यत् तदाद्यं भूतिमिच्छता॥ १४॥
 
 
अनुवाद
अतः उन्नति चाहने वाले मनुष्य को चाहिए कि वह उसी वस्तु का सेवन (या ग्रहण) करे (जिसका कोई हानिकारक परिणाम न हो अर्थात् जो खाने योग्य हो और खाया जा सके, खाने के बाद पच सके (या ग्रहण कर सके) और पचने के बाद लाभदायक हो ॥14॥
 
Therefore, a person who wants to progress should eat (or accept) only that thing (which does not have harmful consequences i.e.) which is edible and can be eaten, can be digested after eating (or accepting) and is beneficial after digestion. ॥ 14॥
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