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mahabharat 5.33.83: जो मन में सदा रहने वाले छह शत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर) को वश में कर लेता है, वह संयमी पुरुष पापों से तो अप्रभावित रहता ही है, उनसे उत्पन्न होने वाली विपत्तियों से भी प्रभावित नहीं होता॥ 83॥   |   mahabharat अध्याय 5.33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  5.33.83 
षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति।
न स पापै: कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रिय:॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
जो मन में सदा रहने वाले छह शत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर) को वश में कर लेता है, वह संयमी पुरुष पापों से तो अप्रभावित रहता ही है, उनसे उत्पन्न होने वाली विपत्तियों से भी प्रभावित नहीं होता॥ 83॥
 
He who controls the six enemies (lust, anger, greed, infatuation, pride and envy) that are ever-present in the mind, that self-controlled person is not only not affected by sins, let alone being affected by the calamities that arise from them.॥ 83॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)