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श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  5.33.77 
पञ्चेन्द्रियस्य मर्त्यस्यच्छिद्रं चेदेकमिन्द्रियम्।
ततोऽस्य स्रवति प्रज्ञा दृते: पात्रादिवोदकम्॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
यदि किसी व्यक्ति की पांचों इंद्रियों में से एक भी दोषपूर्ण हो जाए तो उसकी बुद्धि उसमें से ऐसे बह जाती है जैसे पानी के बर्तन के छेद से पानी बहता है।
 
If even one of the five senses of a person becomes defective, his intellect flows out of it like water flows out of a hole in a waterskin.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)