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mahabharat 5.33.70: तत्! गृहस्थ धर्म में स्थित लक्ष्मीवान के घर में सदैव चार प्रकार के लोगों को रहना चाहिए - अपने कुल का बूढ़ा, विपत्ति में पड़ा हुआ उच्च कुल का व्यक्ति, धनहीन मित्र और सन्तानहीन बहिन ॥70॥   |   mahabharat अध्याय 5.33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  5.33.70 
चत्वारि ते तात गृहे वसन्तु
श्रियाभिजुष्टस्य गृहस्थधर्मे।
वृद्धो ज्ञातिरवसन्न: कुलीन:
सदा दरिद्रो भगिनी चानपत्या॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
तत्! गृहस्थ धर्म में स्थित लक्ष्मीवान के घर में सदैव चार प्रकार के लोगों को रहना चाहिए - अपने कुल का बूढ़ा, विपत्ति में पड़ा हुआ उच्च कुल का व्यक्ति, धनहीन मित्र और सन्तानहीन बहिन ॥70॥
 
Tat! Four types of people should always live in the house of Lakshmivan, situated in Grihastha Dharma – an old man of his family, a person of high caste in distress, a friend without money and a sister without children. 70॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)