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mahabharat 5.33.22: विद्वान व्यक्ति किसी विषय को देर तक सुनता है; परन्तु उसे शीघ्र ही समझ लेता है। समझ लेने के बाद, वह कर्तव्य-भावना से कार्य करता है - इच्छा से नहीं। वह बिना पूछे दूसरों के बारे में कुछ भी व्यर्थ नहीं कहता। उसका यही स्वभाव विद्वान व्यक्ति की मुख्य पहचान है।   |   mahabharat अध्याय 5.33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  5.33.22 
क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति
विज्ञाय चार्थं भजते न कामात्।
नासम्पृष्टो व्युपयुङ्‍‍क्तेपरार्थे
तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य॥ २२॥
 
 
अनुवाद
विद्वान व्यक्ति किसी विषय को देर तक सुनता है; परन्तु उसे शीघ्र ही समझ लेता है। समझ लेने के बाद, वह कर्तव्य-भावना से कार्य करता है - इच्छा से नहीं। वह बिना पूछे दूसरों के बारे में कुछ भी व्यर्थ नहीं कहता। उसका यही स्वभाव विद्वान व्यक्ति की मुख्य पहचान है।
 
A learned man listens to a subject for a long time; but understands it quickly. Having understood, he acts with a sense of duty – not with desire. He does not say anything useless about others without asking. This nature of his is the main identity of a learned person.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)