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mahabharat 5.33.12: जब से संजय पाण्डवों के पास से लौटा है, तब से मेरे मन को पूर्ण शांति नहीं मिल पाई है। मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हैं। मैं इस बात को लेकर बहुत चिंतित हूँ कि कल वह क्या कहेगा॥ 12॥   |   mahabharat अध्याय 5.33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  5.33.12 
यत: प्राप्त: संजय: पाण्डवेभ्यो
न मे यथावन्मनस: प्रशान्ति:।
सर्वेन्द्रियाण्यप्रकृतिं गतानि
किं वक्ष्यतीत्येव मेऽद्य प्रचिन्ता॥ १२॥
 
 
अनुवाद
जब से संजय पाण्डवों के पास से लौटा है, तब से मेरे मन को पूर्ण शांति नहीं मिल पाई है। मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हैं। मैं इस बात को लेकर बहुत चिंतित हूँ कि कल वह क्या कहेगा॥ 12॥
 
Ever since Sanjaya has returned from the Pandavas, my mind has not been able to find complete peace. All my senses are agitated. I am very worried about what he will say tomorrow.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)