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mahabharat 5.33.117: जो विद्वान पुरुष अपने समान व्यक्तियों से विवाह, मित्रता, व्यवहार और वार्तालाप करता है, अपने से हीन व्यक्तियों से नहीं, तथा जो गुणों में श्रेष्ठ व्यक्तियों को सदैव अपने से आगे रखता है, उसकी नीति ही सर्वोत्तम है ॥117॥   |   mahabharat अध्याय 5.33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  5.33.117 
समैर्विवाहं कुरुते न हीनै:
समै: सख्यं व्यवहारं कथां च।
गुणैर्विशिष्टांश्च पुरो दधाति
विपश्चितस्तस्य नया: सुनीता:॥ ११७॥
 
 
अनुवाद
जो विद्वान पुरुष अपने समान व्यक्तियों से विवाह, मित्रता, व्यवहार और वार्तालाप करता है, अपने से हीन व्यक्तियों से नहीं, तथा जो गुणों में श्रेष्ठ व्यक्तियों को सदैव अपने से आगे रखता है, उसकी नीति ही सर्वोत्तम है ॥117॥
 
The policy of a learned person who marries, befriends, deals with and converses with those who are his equals, not with those who are inferior, and who always keeps the superior men ahead of him in qualities, is the best policy. ॥ 117॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)