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mahabharat 5.33.116: जो दान, हवन, देवताओं का पूजन, शुभ कर्म, प्रायश्चित और नाना प्रकार के सांसारिक आचरण करता है - ये नित्य कर्म हैं, उसके स्वर्गारोहण का सुफल देवता प्राप्त करते हैं ॥116॥   |   mahabharat अध्याय 5.33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.33.116 
दानं होमं दैवतं मङ्गलानि
प्रायश्चित्तान् विविधाल्लाँेकवादान्।
एतानि य: कुरुते नैत्यकानि
तस्योत्थानं देवता राधयन्ति॥ ११६॥
 
 
अनुवाद
जो दान, हवन, देवताओं का पूजन, शुभ कर्म, प्रायश्चित और नाना प्रकार के सांसारिक आचरण करता है - ये नित्य कर्म हैं, उसके स्वर्गारोहण का सुफल देवता प्राप्त करते हैं ॥116॥
 
One who does charity, oblation, worship of gods, auspicious works, atonement and various types of worldly conduct – these are the daily deeds, the gods attain the success of his ascension. 116॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)