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mahabharat 5.33.111: जो कभी झगड़ालू वेश धारण नहीं करता, दूसरों के सामने अपने पराक्रम का बखान नहीं करता तथा क्रोध में भरकर भी कभी कटु वचन नहीं बोलता, वह मनुष्य सदैव लोगों का प्रिय होता है ॥111॥   |   mahabharat अध्याय 5.33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  5.33.111 
यो नोद्धतं कुरुते जातु वेषं
न पौरुषेणापि विकत्थतेऽन्यान्।
न मूर्च्छित: कटुकान्याह किंचित्
प्रियं सदा तं कुरुते जनो हि॥ १११॥
 
 
अनुवाद
जो कभी झगड़ालू वेश धारण नहीं करता, दूसरों के सामने अपने पराक्रम का बखान नहीं करता तथा क्रोध में भरकर भी कभी कटु वचन नहीं बोलता, वह मनुष्य सदैव लोगों का प्रिय होता है ॥111॥
 
He who never dresses up like a brawler, never brags about his prowess before others, and never speaks harsh words even when filled with anger, is always loved by people. ॥111॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)