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mahabharat 5.33.109-110: जो क्रोध या उतावली में आकर धर्म, अर्थ और काम का आरम्भ नहीं करता, पूछे जाने पर सत्य बोलता है, मित्रों का झगड़ा पसन्द नहीं करता, आदर न मिलने पर क्रोध नहीं करता, बुद्धि नहीं खोता, दूसरों में दोष नहीं देखता, सब पर दया करता है, असमर्थ होने पर किसी का जमानतदार नहीं बनता, अहंकारपूर्वक नहीं बोलता और वाद-विवाद को सहन करता है, ऐसा पुरुष सर्वत्र प्रशंसित होता है ॥109-110॥   |   mahabharat अध्याय 5.33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद  »  श्लोक 109-110
 
 
श्लोक  5.33.109-110 
न संरम्भेणारभते त्रिवर्ग-
माकारित: शंसति तत्त्वमेव।
न मित्रार्थे रोचयते विवादं
नापूजित: कुप्यति चाप्यमूढ:॥ १०९॥
न योऽभ्यसूयत्यनुकम्पते च
न दुर्बल: प्रातिभाव्यं करोति।
नात्याह किंचित् क्षमते विवादं
सर्वत्र तादृग् लभते प्रशंसाम्॥ ११०॥
 
 
अनुवाद
जो क्रोध या उतावली में आकर धर्म, अर्थ और काम का आरम्भ नहीं करता, पूछे जाने पर सत्य बोलता है, मित्रों का झगड़ा पसन्द नहीं करता, आदर न मिलने पर क्रोध नहीं करता, बुद्धि नहीं खोता, दूसरों में दोष नहीं देखता, सब पर दया करता है, असमर्थ होने पर किसी का जमानतदार नहीं बनता, अहंकारपूर्वक नहीं बोलता और वाद-विवाद को सहन करता है, ऐसा पुरुष सर्वत्र प्रशंसित होता है ॥109-110॥
 
He who does not start Dharma, Artha and Kaam in anger or haste, tells the truth when asked, does not like quarrels for his friends, does not become angry if not respected, does not lose his wisdom, does not look for faults in others, is kind to all, does not stand surety for anybody when he is incapable, does not speak arrogantly and tolerates arguments, such a person is praised everywhere. ॥109-110॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)