श्लोक 1: वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! [संजय के चले जाने के बाद] बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र ने द्वारपाल से कहा - 'मैं विदुर से मिलना चाहता हूँ। उन्हें शीघ्र यहाँ बुलाओ।'
श्लोक 2: धृतराष्ट्र के भेजे हुए दूत ने जाकर विदुर से कहा- 'महामते! हमारे गुरु महाराज धृतराष्ट्र आपसे मिलना चाहते हैं।'
श्लोक 3: उनके ऐसा कहने पर विदुरजी महल में गए और बोले - 'द्वारपाल! धृतराष्ट्र को मेरे आगमन की सूचना दो।'
श्लोक 4: द्वारपाल ने जाकर कहा- महाराज! आपकी आज्ञा से विदुरजी यहाँ आये हैं, वे आपके चरणों के दर्शन करना चाहते हैं। कृपया मुझे आज्ञा दीजिए, मैं उन्हें क्या कार्य बताऊँ?॥4॥
श्लोक 5: धृतराष्ट्र बोले - अत्यंत बुद्धिमान और दूरदर्शी विदुर को भीतर ले आओ, मुझे इस विदुर से मिलने में कभी कोई परेशानी नहीं होती ॥5॥
श्लोक 6: द्वारपाल विदुर के पास आया और बोला, "विदुरजी! आप बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र के अंतःकक्ष में प्रवेश करें। राजा ने मुझसे कहा है कि विदुर से मिलने में मुझे कभी कोई परेशानी नहीं होती।"
श्लोक 7: वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! तत्पश्चात विदुरजी धृतराष्ट्र के महल के अन्दर गए और चिंतित राजा से हाथ जोड़कर बोले - ॥7॥
श्लोक 8: महाप्रज्ञ! मैं विदुर हूँ। आपकी आज्ञा से यहाँ आया हूँ। यदि कोई कार्य हो जो मैं कर सकूँ, तो मैं उपस्थित हूँ। कृपया मुझे आज्ञा दीजिए।॥8॥
श्लोक 9: धृतराष्ट्र ने कहा- विदुर! बुद्धिमान संजय आया था, वह मुझे गाली देकर चला गया है। कल सभा में वह अजातशत्रु युधिष्ठिर के वचन कहेगा॥ 9॥
श्लोक 10: आज मैं उन वीर कुरु युधिष्ठिर के वचनों को समझने में असमर्थ रहा - वही मेरे शरीर को जला रहे हैं और वही मुझे अब तक जगाए हुए हैं॥10॥
श्लोक 11: पिता जी! मैं अभी भी जाग रहा हूँ, चिन्ता से जल रहा हूँ। आप जो भी मेरे लिए अच्छा समझें, वह मुझे बताएँ; क्योंकि हम सब में केवल आप ही धर्म और अर्थ के ज्ञान में निपुण हैं।
श्लोक 12: जब से संजय पाण्डवों के पास से लौटा है, तब से मेरे मन को पूर्ण शांति नहीं मिल पाई है। मेरी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हैं। मैं इस बात को लेकर बहुत चिंतित हूँ कि कल वह क्या कहेगा॥ 12॥
श्लोक 13: विदुर जी बोले - हे राजन! जो बलवानों से झगड़ा करता है, जो साधनहीन है, जिसका सब कुछ छीन लिया गया है, जो कामी है और जो चोर है, उसे रात में नींद नहीं आती।
श्लोक 14: नरेन्द्र! क्या तुम भी इन महान दोषों के सम्पर्क में आये हो? क्या तुम पराये धन के लोभ से पीड़ित हो?॥14॥
श्लोक 15: धृतराष्ट्र बोले, "विदुर! मैं आपके धर्म से परिपूर्ण और मनुष्यों के लिए हितकारी सुन्दर वचन सुनना चाहता हूँ; क्योंकि इस ऋषियों के वंश में आप ही विद्वानों में भी आदरणीय हैं।"
श्लोक d1: विदुरजी ने कहा- महाराज धृतराष्ट्र! उत्तम गुणों से संपन्न राजा युधिष्ठिर तीनों लोकों के स्वामी हो सकते हैं। वे आपके आज्ञाकारी थे, किन्तु आपने उन्हें वन में भेज दिया।
श्लोक d2: आप गुणवान और धर्म के ज्ञाता होते हुए भी नेत्रों की कमी के कारण उसे पहचान नहीं पाए, इस कारण आप उसके घोर विरोधी हो गए और उसे राज्य में भाग देने पर सहमत नहीं हुए।
श्लोक d3: युधिष्ठिर में क्रूरता का अभाव है, करुणा, सदाचार, सत्य और वीरता है; उनका मन विनम्र है। इन्हीं गुणों के कारण वे अनेक कष्टों को सोच-समझकर चुपचाप सहन कर रहे हैं।
श्लोक d4: दुर्योधन, शकुनि, कर्ण और दुशासन जैसे अयोग्य व्यक्तियों पर राज्य का भार डालकर आप कल्याण कैसे चाहते हैं?
श्लोक d5: अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान, उद्योग, दुःख सहने की शक्ति और धर्म में स्थिरता - ये गुण जिसके पुरुषार्थ करने से नहीं रोकते, उसे पंडित कहते हैं।
श्लोक 16: जो अच्छे कर्म करता है और बुरे कर्मों से दूर रहता है तथा आस्तिक और भक्त भी है, ये गुण ही विद्वान् होने के लक्षण हैं ॥16॥
श्लोक 17: जो क्रोध, हर्ष, मान, लज्जा, अहंकार से भ्रष्ट नहीं है और जो अपने प्रयत्नों से अपने को पूजनीय मानता है, उसे पंडित कहते हैं ॥17॥
श्लोक 18: जिसके कर्तव्य, उपदेश और विचार दूसरों को ज्ञात नहीं होते, अपितु कार्य पूर्ण होने पर ही ज्ञात होते हैं, उसे विद्वान् कहते हैं ॥18॥
श्लोक 19: जिसका कर्म सर्दी या गर्मी, भय या स्नेह, धन या दरिद्रता से प्रभावित नहीं होता, उसे विद्वान् कहते हैं ॥19॥
श्लोक 20: जिसकी सांसारिक बुद्धि केवल धर्म और अर्थ का अनुसरण करती है तथा जो सांसारिक सुखों को त्यागकर केवल मानवीय प्रयास को चुनता है, उसे विद्वान व्यक्ति कहा जाता है।
श्लोक 21: बुद्धि संपन्न पुरुष अपनी शक्ति के अनुसार कार्य करने की इच्छा रखता है और वह वैसा ही करता भी है। वह किसी भी वस्तु को तुच्छ समझकर उसकी उपेक्षा नहीं करता ॥22॥
श्लोक 22: विद्वान व्यक्ति किसी विषय को देर तक सुनता है; परन्तु उसे शीघ्र ही समझ लेता है। समझ लेने के बाद, वह कर्तव्य-भावना से कार्य करता है - इच्छा से नहीं। वह बिना पूछे दूसरों के बारे में कुछ भी व्यर्थ नहीं कहता। उसका यही स्वभाव विद्वान व्यक्ति की मुख्य पहचान है।
श्लोक 23: जो पुरुष विद्वानों के समान बुद्धि रखते हैं, वे दुर्लभ वस्तुओं की इच्छा नहीं करते, खोई हुई वस्तु के लिए शोक नहीं करते और विपत्ति आने पर घबराते नहीं हैं ॥23॥
श्लोक 24: जो पहले निर्णय लेता है और फिर काम शुरू करता है, काम के बीच में नहीं रुकता, समय बर्बाद नहीं करता और अपने मन को नियंत्रण में रखता है, उसे विद्वान व्यक्ति कहते हैं।
श्लोक 25: भरतकुलभूषण! पंडित लोग अच्छे कर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के लिए कार्य करते हैं और अच्छे कर्म करने वालों में दोष नहीं देखते॥25॥
श्लोक 26: जो सम्मान पाकर प्रसन्न नहीं होता, अनादर पाकर व्याकुल नहीं होता, तथा जिसका मन गंगा के हृदय के गहरे गर्त के समान व्याकुल नहीं होता, वह विद्वान् पुरुष कहलाता है।
श्लोक 27: जो सम्पूर्ण भौतिक पदार्थों की वास्तविकता को जानता है, सम्पूर्ण कार्यों को करने का तरीका जानता है तथा साधनों को जानने में मनुष्यों में श्रेष्ठ है, उसे विद्वान् पुरुष कहते हैं।
श्लोक 28: जिसकी वाणी कभी रुकती नहीं, जो विचित्र ढंग से बोलता है, तर्क करने में निपुण और बुद्धिमान है, तथा जो किसी ग्रन्थ का तात्पर्य शीघ्रता से समझा सकता है, उसे पंडित कहते हैं।
श्लोक 29: जिसका ज्ञान बुद्धि के अनुसार चलता है और जो बुद्धि तथा शिष्ट लोगों की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता, वही विद्वान् कहा जा सकता है।
श्लोक 30: जो व्यक्ति विद्या के बिना ही अभिमानी है, जो दरिद्र होकर भी बड़ी-बड़ी महत्वाकांक्षाएँ रखता है, तथा जो बिना परिश्रम किए ही धन कमाना चाहता है, उसे विद्वान लोग मूर्ख कहते हैं ॥30॥
श्लोक 31: जो अपना कर्तव्य छोड़कर दूसरों का कर्तव्य करता है और मित्रों के साथ बुरा व्यवहार करता है, वह मूर्ख कहलाता है ॥31॥
श्लोक 32: जो अपने से प्रेम न करनेवालों से प्रेम करता है, अपने से प्रेम करनेवालों को त्याग देता है, तथा अपने से बलवानों को शत्रु बना लेता है, वह मूढ़ विचारवाला मनुष्य कहलाता है ॥32॥
श्लोक 33: जो शत्रु को भी मित्र बना लेता है, मित्र से द्वेष रखता है, उसे दुःख देता है, तथा सदैव बुरे कर्म करने लगता है, वह मूढ़ बुद्धि वाला कहा जाता है ॥33॥
श्लोक 34: हे भरतश्रेष्ठ! जो व्यक्ति अपने कार्य को अनावश्यक रूप से टालता है, हर बात में संदेह करता है तथा शीघ्र किये जाने वाले कार्य को भी टालता है, वह मूर्ख है।
श्लोक 35: जो अपने पितरों का श्राद्ध और देवताओं का पूजन नहीं करता तथा जिसे अच्छा मित्र नहीं मिलता, वह मूर्ख मनुष्य कहलाता है ॥35॥
श्लोक 36: मूर्ख मनुष्य बिना बुलाए ही आ जाता है, बिना पूछे ही बहुत बोलता है, और अविश्वासी पर भी विश्वास कर लेता है ॥36॥
श्लोक 37: जो स्वयं तो दोषपूर्ण आचरण करता है, परन्तु फिर भी दूसरों के दोष बताता है और जो विवश होकर भी बिना कारण क्रोध करता है, वह महान मूर्ख है ॥37॥
श्लोक 38: जो मनुष्य अपनी शक्ति को न समझकर, बिना कुछ किए ही, धर्म और अर्थ के विरुद्ध तथा अप्राप्य वस्तु की इच्छा करता है, वह इस संसार में मूर्ख कहलाता है।
श्लोक 39: राजन! जो मनुष्य अयोग्य को उपदेश देता है, शून्य की पूजा करता है और कंजूस का आश्रय लेता है, वह मूढ़ बुद्धि वाला कहा जाता है ॥39॥
श्लोक 40: जो बहुत धन, विद्या और ऐश्वर्य पाकर भी अभिमान नहीं करता, वह विद्वान् कहलाता है ॥40॥
श्लोक 41: जो मनुष्य अच्छा भोजन करता है और अच्छे वस्त्र पहनता है, उससे बढ़कर क्रूर कौन हो सकता है, जो उसे अपने पालन-पोषण के योग्य लोगों के साथ बाँटकर नहीं खाता और अकेले ही अच्छे वस्त्र पहनता है ॥ 41॥
श्लोक 42: मनुष्य ही पाप करके धन कमाता है और बहुत से लोग उसका उपभोग करते हैं। जो लोग उसका उपभोग करते हैं, वे पाप से मुक्त होते हैं, परन्तु उसका कर्ता दोषी होता है॥ 42॥
श्लोक 43: वीर धनुर्धर का चलाया हुआ बाण किसी को मारे या न मारे, परन्तु बुद्धिमान् पुरुष की बुद्धि राजा के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र का भी नाश कर सकती है ॥ 43॥
श्लोक 44: एक (बुद्धि) और दो (कर्तव्य और अकर्तव्य) का निश्चय करके चार (शुभ, दान, भेद, दण्ड) और तीन (शत्रु, मित्र और अकर्म) को वश में कर। पाँच (इन्द्रियों) को जीतकर और छः (संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधिभाव और समाश्रयरूप) गुणों को जानकर तथा सात (स्त्री, जुआ, मृगया, मद्य, कठोर वचन, दण्ड की कठोरता और अन्याय से धन कमाना) का त्याग करके सुखी हो। 44॥
श्लोक 45: विष का रस पीने वाले को ही मारता है, शस्त्र से भी एक ही व्यक्ति मरता है; किन्तु गुप्त मंत्रणा का प्रकट होना न केवल राष्ट्र और प्रजा का, अपितु राजा का भी नाश कर देता है।
श्लोक 46: अकेले स्वादिष्ट भोजन न करो, अकेले किसी बात का निर्णय न करो, अकेले मार्ग पर न चलो और यदि बहुत से लोग सो रहे हों तो अकेले न जागते रहो ॥46॥
श्लोक 47: राजा ! जैसे समुद्र पार करने के लिए नाव ही एकमात्र साधन है, वैसे ही स्वर्ग जाने के लिए सत्य ही एकमात्र सीढ़ी है, उसके अतिरिक्त कोई अन्य नहीं है; परन्तु आप इस बात को नहीं समझ रहे हैं ॥47॥
श्लोक 48: लोगों पर क्षमा करने का आरोप सिर्फ़ एक ही दोष है, दूसरे की कोई संभावना नहीं। वह दोष यह है कि लोग क्षमा करने वाले व्यक्ति को अयोग्य समझते हैं।
श्लोक 49: परन्तु क्षमाशील मनुष्य को दोषी नहीं समझना चाहिए; क्योंकि क्षमा महान् शक्ति है। क्षमा असमर्थों का गुण और समर्थों का आभूषण है। 49॥
श्लोक 50: इस संसार में क्षमा एक प्रकार का सम्मोहन है। भला, क्षमा से क्या प्राप्त नहीं होता? जिसके हाथ में शांतिरूपी तलवार है, उसका दुष्ट लोग क्या बिगाड़ सकते हैं?॥50॥
श्लोक 51: घास रहित स्थान में लगी आग स्वयं ही बुझ जाती है। क्षमाहीन मनुष्य अपने लिए तथा दूसरों के लिए भी पाप का कारण बनता है ॥ 51॥
श्लोक 52: केवल धर्म ही कल्याण का सर्वोत्तम साधन है, केवल क्षमा ही शांति का सर्वोत्तम साधन है। केवल ज्ञान ही परम संतोष प्रदान करता है और केवल अहिंसा ही सुख प्रदान करती है॥ 52॥
श्लोक d6: समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी पर दो प्रकार के क्षुद्र मनुष्य हैं - निष्क्रिय गृहस्थ और कर्म में संलग्न संन्यासी।
श्लोक 53: जैसे साँप बिलों में रहने वाले प्राणियों को खा जाता है, वैसे ही यह पृथ्वी शत्रु का विरोध न करने वाले राजा और परदेश गमन न करने वाले ब्राह्मण, दोनों को खा जाती है ॥ 53॥
श्लोक 54: कदापि कटुवचन न बोलें और दुष्ट पुरुषों का आदर न करें - ये दो कर्म करने वाला मनुष्य इस संसार में विशेष रूप से सम्मानित होता है ॥ 54॥
श्लोक 55: जो स्त्रियाँ परस्त्री द्वारा इच्छित पुरुष की कामना करती हैं और जो पुरुष दूसरों द्वारा पूजित पुरुष का आदर करते हैं, ये दो प्रकार के लोग दूसरों पर विश्वास करके उसके अनुसार आचरण करते हैं ॥ 55॥
श्लोक 56: जो दरिद्र होकर भी बहुमूल्य वस्तुओं की इच्छा करता है और जो उन्हें प्राप्त न कर पाने पर भी क्रोध करता है - ये दोनों उसके लिए तीखे काँटों के समान हैं और उसके शरीर को सुखा देने वाले हैं ॥ 56॥
श्लोक 57: केवल दो ही चीजें अपने विपरीत कर्मों के कारण अच्छी नहीं लगतीं - निष्क्रिय गृहस्थ और सांसारिक कार्यों में लिप्त साधु।
श्लोक 58: हे राजन! ये दो प्रकार के पुरुष स्वर्ग से भी ऊपर स्थान प्राप्त करते हैं - एक जो बलवान होकर भी क्षमाशील है और दूसरा जो दरिद्र होकर भी दान देता है ॥ 58॥
श्लोक 59: उचित साधनों से अर्जित धन के दो ही दुरुपयोग हैं - उसे अयोग्य को देना और सुपात्र को न देना ॥59॥
श्लोक 60: जो मनुष्य धनवान होकर भी दान नहीं देता और जो दरिद्र होकर भी दुःख सहन नहीं कर सकता - इन दो प्रकार के लोगों को गले में मजबूत पत्थर बाँधकर पानी में डुबो देना चाहिए ॥60॥
श्लोक 61: हे पुरुषोत्तम! सूर्यमण्डल को भेदकर ऊर्ध्वगति को प्राप्त करने वाले पुरुष दो प्रकार के होते हैं - योगयुक्त तपस्वी और शत्रुओं के सामने युद्ध में मारा गया योद्धा ॥61॥
श्लोक 62: हे भारतश्रेष्ठ! वेदवेत्ता जानते हैं कि मनुष्य के कार्यों की सिद्धि के लिए तीन प्रकार के उपाय सुने जाते हैं - उत्तम, मध्यम और अधम ॥62॥
श्लोक 63: राजन! उत्तम, मध्यम और अधम - ये तीन प्रकार के पुरुष हैं; इनका उपयोग उनकी उपयुक्तता के अनुसार तीन प्रकार के कार्यों में करना चाहिए ॥63॥
श्लोक 64: हे राजन! केवल तीन ही धन के अधिकारी नहीं माने जाते - पत्नी, पुत्र और दास। वे जो कुछ कमाते हैं, वह धन उसी का होता है जिसके अधीन वे रहते हैं।
श्लोक 65: दूसरे के धन की चोरी, दूसरे की स्त्री के साथ सहवास तथा अच्छे मित्र का परित्याग - ये तीनों दोष मनुष्य के जीवन, धर्म और यश को नष्ट कर देते हैं ॥65॥
श्लोक 66: काम, क्रोध और लोभ ये तीन नरक के द्वार हैं जो आत्मा का नाश करते हैं; अतः इन तीनों का त्याग कर देना चाहिए ॥ 66॥
श्लोक 67: भरत! वरदान पाना, राज्य पाना और पुत्र उत्पन्न करना - ये तीनों एक ओर हैं और शत्रुओं के कष्टों से मुक्ति पाना दूसरी ओर है; ये तीनों और यह तीनों समान हैं।
श्लोक 68: भक्त, सेवक और 'मैं तुम्हारा हूँ' कहने वाला - इन तीन प्रकार के शरणागत पुरुषों को संकट में भी नहीं छोड़ना चाहिए ॥ 68॥
श्लोक 69: अल्पबुद्धि, दीर्घचित्त, शीघ्रदर्शी और प्रशंसा करने वाले लोगों को गुप्त सलाह नहीं देनी चाहिए। ये चारों बलवान राजा के लिए त्याग करने योग्य कहे गए हैं। विद्वान पुरुष को ऐसे लोगों को पहचान लेना चाहिए। 69॥
श्लोक 70: तत्! गृहस्थ धर्म में स्थित लक्ष्मीवान के घर में सदैव चार प्रकार के लोगों को रहना चाहिए - अपने कुल का बूढ़ा, विपत्ति में पड़ा हुआ उच्च कुल का व्यक्ति, धनहीन मित्र और सन्तानहीन बहिन ॥70॥
श्लोक 71: महाराज! जब इन्द्र ने इन चार बातों के विषय में पूछा, तब बृहस्पतिजी ने उन्हें तत्काल फल देने वाली बातें बताईं ॥ 71॥
श्लोक 72: देवताओं का दृढ निश्चय, बुद्धिमानों का प्रभाव, विद्वानों की विनम्रता और पापियों का विनाश ॥72॥
श्लोक 73: भय को दूर करने वाले चार कर्म हैं; किन्तु यदि वे ठीक प्रकार से न किए जाएँ, तो भय उत्पन्न करते हैं। वे कर्म हैं - आदरपूर्वक अग्निहोत्र, आदरपूर्वक मौनव्रत, आदरपूर्वक स्वाध्याय और आदरपूर्वक यज्ञ करना॥ 73॥
श्लोक 74: हे भारतश्रेष्ठ! पिता, माता, अग्नि, आत्मा और गुरु - मनुष्य को इन पाँच अग्नियों की बड़े यत्न से सेवा करनी चाहिए ॥74॥
श्लोक 75: जो मनुष्य देवता, पितर, मनुष्य, मुनि और अतिथि - इन पाँचों का पूजन करता है, वह शुद्ध यश प्राप्त करता है ॥ 75॥
श्लोक 76: राजन! जहाँ भी आप जाएँगे, वहाँ मित्र, शत्रु, उदासीन, आश्रयदाता और आश्रयग्राही - ये पाँचों आपके पीछे-पीछे चलेंगे ॥ 76॥
श्लोक 77: यदि किसी व्यक्ति की पांचों इंद्रियों में से एक भी दोषपूर्ण हो जाए तो उसकी बुद्धि उसमें से ऐसे बह जाती है जैसे पानी के बर्तन के छेद से पानी बहता है।
श्लोक 78: जो मनुष्य समृद्धि या उन्नति चाहते हैं, उन्हें निद्रा, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य और टालमटोल (शीघ्र करने योग्य कार्य में अधिक समय लगाने की आदत) - ये छह दुर्गुण त्याग देने चाहिए। 78॥
श्लोक 79-80: जो गुरु शिक्षा नहीं देता, जो मन्त्र नहीं पढ़ता, जो राजा दूसरों की रक्षा करने में असमर्थ है, जो स्त्री कटु वचन बोलती है, जो ग्वाला गांव में रहना चाहता है और जो नाई वन में रहना चाहता है - इन छहों को उसी प्रकार त्याग देना चाहिए, जैसे समुद्र में जाने वाला मनुष्य छेद वाली नाव को त्याग देता है।
श्लोक 81: मनुष्य को सत्य, दान, परिश्रम, अनसूया (गुणों में दोष प्रकट करने की प्रवृत्ति का अभाव), क्षमा और धैर्य - इन छः गुणों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए ॥81॥
श्लोक 82: राजन! धन की प्राप्ति, सदा स्वस्थ रहना, प्रिय और स्नेही पत्नी का होना, पुत्र के वश में रहना और धन उत्पन्न करने वाली विद्या का ज्ञान - ये छह बातें इस मनुष्य लोक में सुख पहुँचाती हैं ॥82॥
श्लोक 83: जो मन में सदा रहने वाले छह शत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर) को वश में कर लेता है, वह संयमी पुरुष पापों से तो अप्रभावित रहता ही है, उनसे उत्पन्न होने वाली विपत्तियों से भी प्रभावित नहीं होता॥ 83॥
श्लोक 84-85: निम्नलिखित छह प्रकार के लोग छह प्रकार के लोगों से अपनी जीविका चलाते हैं, सातवां नहीं मिलता। चोर लापरवाह लोगों से, वैद्य बीमार लोगों से, कामातुर स्त्रियाँ कामातुर पुरुषों से, पुरोहित यजमानों से, राजा झगड़ालू लोगों से और विद्वान मूर्खों से अपनी जीविका चलाते हैं।
श्लोक 86: गौ, सेवा, कृषि, स्त्री, शिक्षा और शूद्रों का संग - ये छः वस्तुएँ यदि थोड़ी भी देर तक ध्यान न रखा जाए तो नष्ट हो जाती हैं ॥ 86॥
श्लोक 87-88: ये छह लोग आमतौर पर अपने पूर्व उपकारकर्ताओं का हमेशा सम्मान नहीं करते हैं - एक शिष्य अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने गुरु का सम्मान करता है, एक विवाहित पुत्र अपनी मां का सम्मान करता है, एक पुरुष अपनी यौन इच्छा पूरी होने के बाद अपनी स्त्री का सम्मान करता है, एक पुरुष अपना काम पूरा होने के बाद अपने सहायक का सम्मान करता है, एक व्यक्ति नदी के कठिन भाग को पार करने के बाद अपनी नाव का सम्मान करता है और एक बीमार व्यक्ति अपनी बीमारी से ठीक होने के बाद अपने चिकित्सक का सम्मान करता है।
श्लोक 89: हे राजन! स्वस्थ रहना, ऋणग्रस्त न होना, परदेश में न रहना, सज्जनों का संग करना, अपने कर्म से जीविका चलाना और निर्भय होकर रहना - ये मनुष्य लोक के छः सुख हैं।
श्लोक 90: ईर्ष्यालु, द्वेषी, असंतुष्ट, क्रोधी, सदैव शंकालु तथा दूसरों के भाग्य पर निर्भर रहने वाला - ये छह लोग सदैव दुखी रहते हैं।
श्लोक 91-92: स्त्रियों में आसक्ति, जुआ, शिकार, मद्यपान, वाणी की कठोरता, अत्यन्त कठोर दण्ड देना और धन का दुरुपयोग - ये सात दुःखदायी दुर्गुण राजा को सदैव त्याग देने चाहिए। इनके द्वारा बलवान राजा भी प्रायः नष्ट हो जाते हैं ॥91-92॥
श्लोक 93-95: जो मनुष्य विनाश को प्राप्त होने वाला है, उसके आठ पूर्व लक्षण हैं । पहले वह ब्राह्मणों से द्वेष करता है, फिर उनका विरोध करने लगता है, उनका धन हड़प लेता है, उन्हें मार डालना चाहता है, ब्राह्मणों की निन्दा करने में सुख पाता है, उनकी स्तुति सुनना नहीं चाहता, यज्ञ आदि में उनका स्मरण नहीं करता तथा कुछ मांगने पर उनमें दोष निकालने लगता है । बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि इन सब दोषों को समझकर उन्हें त्याग दे ॥93-95॥
श्लोक 96-98: हे भारत! मित्रों से मिलना, अधिक धन प्राप्त करना, अपने पुत्र का आलिंगन करना, मैथुन करना, उचित समय पर मधुर वचन बोलना, अपने ही वर्ग के लोगों में उन्नति करना, इच्छित वस्तु की प्राप्ति और समाज में सम्मान पाना - ये आठ सुख के सार हैं और ये ही हमारे सांसारिक सुख के साधन भी हैं॥ 96-98॥
श्लोक 99: बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रिय-संयम, शास्त्र-ज्ञान, पराक्रम, अधिक न बोलना, शक्ति के अनुसार दान और कृतज्ञता - ये आठ गुण मनुष्य की कीर्ति बढ़ाने वाले हैं ॥99॥
श्लोक 100: जो विद्वान् पुरुष इस शरीररूपी घर को, जिसके नौ द्वार (आँख, कान आदि) हैं, जिसके (सत्व, रज और तम रूपी) तीन स्तंभ हैं, जिसके (इन्द्रिय रूपी) पाँच साक्षी हैं, जो आत्मा का निवास है, तत्त्वों से जानता है, वह बड़ा ज्ञानी पुरुष है ॥100॥
श्लोक 101-102: महाराज धृतराष्ट्र! जो लोग धर्म के तत्त्व को नहीं जानते, वे दस प्रकार के हैं। उनके नाम सुनो। मतवाले, प्रमादी, उन्मत्त, थके हुए, क्रोधी, भूखे, उतावले, लोभी, भयभीत और कामी - ये दस हैं। अतः विद्वान पुरुष को इन सब लोगों में आसक्त नहीं होना चाहिए। ॥101-102॥
श्लोक 103: इसी विषय पर दैत्यराज प्रह्लाद ने सुधन्वा के साथ अपने पुत्र को कुछ उपदेश दिया था। राजनीतिज्ञ उस प्राचीन कथा का उदाहरण देते हैं॥103॥
श्लोक 104: जो राजा काम और क्रोध का त्याग करता है, सुपात्रों को धन देता है, विद्वान है, शास्त्रों को जानता है और अपने कर्तव्य को शीघ्रता से पूरा करता है, उसके (उनके आचरण और वचन) सब लोग प्रमाण मानकर स्वीकार करते हैं ॥104॥
श्लोक 105: जो मनुष्यों में विश्वास उत्पन्न करना जानता है, जो केवल उन्हीं को दण्ड देता है जिनका अपराध सिद्ध हो चुका है, जो दण्ड की मात्रा तथा क्षमा का उपयोग जानता है, उस राजा का सारा धन उसके काम आता है ॥105॥
श्लोक 106: जो दुर्बल का अपमान नहीं करता, सदा सावधान रहता है और शत्रु के साथ बुद्धिमानी से व्यवहार करता है, बलवान से युद्ध करना पसन्द नहीं करता और समय आने पर वीरता दिखाता है, वह धैर्यवान है ॥106॥
श्लोक 107: जो महान् और बुद्धिमान् पुरुष विपत्ति से कभी दुःखी नहीं होता, अपितु जो सावधानी के साथ परिश्रम का आश्रय लेता है और उचित समय पर कष्ट सहता है, उसके शत्रु अवश्य ही पराजित हो जाते हैं ॥107॥
श्लोक 108: जो मनुष्य घर छोड़कर व्यर्थ भ्रमण, पापियों की संगति, व्यभिचार, पाखण्ड, चोरी, चुगली और मदिरापान नहीं करता, वह सदा सुखी रहता है ॥108॥
श्लोक 109-110: जो क्रोध या उतावली में आकर धर्म, अर्थ और काम का आरम्भ नहीं करता, पूछे जाने पर सत्य बोलता है, मित्रों का झगड़ा पसन्द नहीं करता, आदर न मिलने पर क्रोध नहीं करता, बुद्धि नहीं खोता, दूसरों में दोष नहीं देखता, सब पर दया करता है, असमर्थ होने पर किसी का जमानतदार नहीं बनता, अहंकारपूर्वक नहीं बोलता और वाद-विवाद को सहन करता है, ऐसा पुरुष सर्वत्र प्रशंसित होता है ॥109-110॥
श्लोक 111: जो कभी झगड़ालू वेश धारण नहीं करता, दूसरों के सामने अपने पराक्रम का बखान नहीं करता तथा क्रोध में भरकर भी कभी कटु वचन नहीं बोलता, वह मनुष्य सदैव लोगों का प्रिय होता है ॥111॥
श्लोक 112: जो बुझी हुई शत्रुता की अग्नि को पुनः नहीं जलाता, अभिमान नहीं करता, हीनता नहीं दिखाता तथा अपने को कठिन परिस्थिति में पड़ा हुआ समझकर अनुचित कार्य नहीं करता, वह सदाचारी पुरुष आर्यों द्वारा श्रेष्ठ कहा गया है ॥112॥
श्लोक 113: जो अपने सुख से प्रसन्न नहीं होता, दूसरों के दुःख से प्रसन्न नहीं होता और दान देने के बाद भी पश्चाताप नहीं करता, वह सज्जनों में पुण्यात्मा कहा गया है ॥113॥
श्लोक 114: जो व्यक्ति देश के रीति-रिवाजों, अवसरों और जातियों के धर्मों को विस्तार से जानने का प्रयास करता है, वह श्रेष्ठ और निकृष्ट में भेद करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। वह जहाँ भी जाता है, वहाँ एक बड़े समूह पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेता है ॥114॥
श्लोक 115: जो बुद्धिमान् पुरुष अभिमान, मोह, काम, पापकर्म, द्रोह, चुगली, समूहद्वेष, मद्यप, पागल और दुष्ट लोगों से विवाद का त्याग कर देता है, वह श्रेष्ठ है ॥115॥
श्लोक 116: जो दान, हवन, देवताओं का पूजन, शुभ कर्म, प्रायश्चित और नाना प्रकार के सांसारिक आचरण करता है - ये नित्य कर्म हैं, उसके स्वर्गारोहण का सुफल देवता प्राप्त करते हैं ॥116॥
श्लोक 117: जो विद्वान पुरुष अपने समान व्यक्तियों से विवाह, मित्रता, व्यवहार और वार्तालाप करता है, अपने से हीन व्यक्तियों से नहीं, तथा जो गुणों में श्रेष्ठ व्यक्तियों को सदैव अपने से आगे रखता है, उसकी नीति ही सर्वोत्तम है ॥117॥
श्लोक 118: जो व्यक्ति थोड़ा खाता है और अपने आश्रितों में बांटकर खाता है, कड़ी मेहनत करने पर भी कम सोता है, तथा जो व्यक्ति अपने मित्र नहीं हैं, उनके मांगने पर उन्हें धन देता है, उस बुद्धिमान व्यक्ति से सभी विपत्तियां दूर रहती हैं।
श्लोक 119: जो अपनी इच्छा के अनुकूल और दूसरों की इच्छा के विरुद्ध कार्य करता है, उसके विषय में दूसरे लोग कुछ नहीं जान सकते। क्योंकि मंत्र गुप्त रहता है और इच्छित कार्य ठीक प्रकार से संपन्न होता है, इसलिए उसका किंचित मात्र भी कार्य बिगड़ नहीं सकता ॥119॥
श्लोक 120: जो मनुष्य सब प्राणियों को शांति देने में तत्पर रहता है, सत्यवादी, सज्जन, दूसरों का आदर करने वाला और शुद्ध विचारों वाला होता है, वह अपनी जाति के लोगों में उत्तम खान से निकले हुए चमकते हुए रत्न के समान प्रसिद्ध होता है ॥120॥
श्लोक 121: जो स्वयं अत्यंत विनम्र है, वही सब लोगों में श्रेष्ठ माना जाता है। वह अपने अनन्त तेज, शुद्ध हृदय और एकाग्रता के कारण सूर्य के समान चमकता है॥121॥
श्लोक 122: अम्बिकानन्दन! राजा पाण्डु के पाँचों पुत्र, जो मृगरूपी ऋषि किन्दम के शाप से वन में उत्पन्न हुए थे, पाँचों इन्द्रियों के समान ही शक्तिशाली हैं। आपने ही उन्हें बचपन से पाला-पोसा और शिक्षित किया है। वे भी आपकी आज्ञा का पालन करते रहते हैं॥122॥
श्लोक 123: पिता जी! उन्हें राज्य का उचित भाग देकर आप अपने पुत्रों के साथ जीवन का आनंद लें। हे प्रभु! ऐसा करने से आप देवताओं और मनुष्यों की निन्दा का विषय नहीं रहेंगे। 123।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥