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mahabharat 5.32.17: हे भरतवंश के अधिपति! इस समय आप अपने पुत्रों के प्रभाव से पाण्डवों को पृथक करके उनका सारा धन अकेले ही हड़प लेना चाहते हैं; प्रथमतः तो इसकी सफलता संदिग्ध है। (और यदि सफल भी हो जाएँ, तो) इस अधर्म के कारण इस लोक में आपकी बड़ी निन्दा होगी। अतः यह कार्य आपके योग्य कदापि नहीं है।॥17॥   |   mahabharat अध्याय 5.32: अर्जुनद्वारा कौरवोंके लिये संदेश देना, संजयका हस्तिनापुर जा धृतराष्ट्रसे मिलकर उन्हें युधिष्ठिरका कुशल-समाचार कहकर धृतराष्ट्रके कार्यकी निन्दा करना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 32: अर्जुनद्वारा कौरवोंके लिये संदेश देना, संजयका हस्तिनापुर जा धृतराष्ट्रसे मिलकर उन्हें युधिष्ठिरका कुशल-समाचार कहकर धृतराष्ट्रके कार्यकी निन्दा करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  5.32.17 
स त्वमर्थं संशयितं विना तै-
राशंससे पुत्रवशानुगोऽस्य।
अधर्मशब्दश्च महान् पृथिव्यां
नेदं कर्म त्वत्समं भारताग्रॺ॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे भरतवंश के अधिपति! इस समय आप अपने पुत्रों के प्रभाव से पाण्डवों को पृथक करके उनका सारा धन अकेले ही हड़प लेना चाहते हैं; प्रथमतः तो इसकी सफलता संदिग्ध है। (और यदि सफल भी हो जाएँ, तो) इस अधर्म के कारण इस लोक में आपकी बड़ी निन्दा होगी। अतः यह कार्य आपके योग्य कदापि नहीं है।॥17॥
 
O head of the Bharat dynasty! At this time, under the influence of your sons, you want to separate the Pandavas and take all their wealth alone; first of all, its success is doubtful. (And even if you succeed,) you will be greatly criticized in this world due to this unrighteousness. Therefore, this task is not worthy of you at all. ॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)