श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 30: संजयकी विदाई तथा युधिष्ठिरका संदेश  »  श्लोक 48-49
 
 
श्लोक  5.30.48-49 
इदं पुनर्वचनं धार्तराष्ट्रं
सुयोधनं संजय श्रावयेथा:।
यस्ते शरीरे हृदयं दुनोति
काम: कुरूनसपत्नोऽनुशिष्याम्॥ ४८॥
न विद्यते युक्तिरेतस्य काचि-
न्नैवंविधा: स्याम यथा प्रियं ते।
ददस्व वा शक्रपुरीं ममैव
युध्यस्व वा भारतमुख्य वीर॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
संजय! दुर्योधन से मेरे ये वचन दोहराओ- 'कौरवों पर निर्विघ्न शासन करने की जो इच्छा तुम्हारे मन में उत्पन्न हुई है, वह तुम्हारे हृदय को ही दुःख दे रही है। उसकी प्राप्ति का कोई उपाय नहीं है। हममें पुरुषार्थ की इतनी कमी नहीं है कि हम तुम्हारा यह प्रिय कार्य होने दें। हे भरतवंश के प्रधान योद्धा! या तो इन्द्रप्रस्थपुरी मुझे लौटा दो या युद्ध करो।'॥48-49॥
 
Sanjay! Repeat my words to Duryodhan-'The desire that has arisen in your mind to rule the Kauravas without any obstacles is only giving pain to your heart. There is no way to achieve it. We are not so lacking in manliness that we will let this beloved work of yours happen. O chief warrior of Bharat dynasty! Either return Indraprasthapuri to me or fight the war.'॥ 48-49॥
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि युधिष्ठिरसंदेशे त्रिंशोऽध्याय:॥ ३०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें युधिष्ठिरसंदेशविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३०॥

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं।]
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)