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mahabharat 5.30.44: संजय! मेरी सलाह है कि तुम उन अनाथ, दुर्बल और मूर्खों के पास जाओ जो सदैव अपने शरीर का भरण-पोषण करने का प्रयत्न करते रहते हैं और हर प्रकार से उनका कुशल-क्षेम पूछो। ॥44॥   |   mahabharat अध्याय 5.30: संजयकी विदाई तथा युधिष्ठिरका संदेश   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.30.44 
ये चानाथा दुर्बला: सर्वकाल-
मात्मन्येव प्रयतन्तेऽथ मूढा:।
तांश्चापि त्वं कृपणान् सर्वथैव
ह्यस्मद्वाक्यात् कुशलं तात पृच्छे:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
संजय! मेरी सलाह है कि तुम उन अनाथ, दुर्बल और मूर्खों के पास जाओ जो सदैव अपने शरीर का भरण-पोषण करने का प्रयत्न करते रहते हैं और हर प्रकार से उनका कुशल-क्षेम पूछो। ॥44॥
 
Sanjay! On my advice you should go to those orphans, the weak and the foolish who always try to feed their bodies and inquire about their well-being in every possible way. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)