श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 30: संजयकी विदाई तथा युधिष्ठिरका संदेश  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  5.30.34-35 
या नो भार्या: संजय वेत्थ तत्र
तासां सर्वासां कुशलं तात पृच्छे:।
सुसंगुप्ता: सुरभयोऽनवद्या:
कच्चिद् गृहानावसथाप्रमत्ता:॥ ३४॥
कच्चिद् वृत्तिं श्वशुरेषु भद्रा:
कल्याणीं वर्तध्वमनृशंसरूपाम्।
यथा च व: स्यु: पतयोऽनुकूला-
स्तथा वृत्तिमात्मन: स्थापयध्वम्॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
प्रिय संजय! तुम हस्तिनापुर में हमारे भाइयों की पत्नियों को जानते हो। उनका कुशल-क्षेम पूछो और बताओ कि क्या तुम पूर्णतः सुरक्षित और निष्कलंक जीवन जी रही हो? क्या तुम्हें आवश्यक सुगंधियाँ और अन्य प्रसाधन सामग्री मिलती है? क्या तुम घर में किसी प्रकार की लापरवाही नहीं बरतती? हे पूज्य स्त्रियों, क्या तुम अपने ससुराल वालों के साथ सद्व्यवहार करती हो और अपने पतियों के समान आचरण और सद्भावना को अपने हृदय में धारण करती हो?॥34-35॥
 
Dear Sanjaya, you know the wives of our brothers in Hastinapur. Ask about their well-being and tell them whether you are living a completely safe and blameless life? Do you get the necessary perfumes and other cosmetics? Do you live without any negligence in the house? Respected women, do you behave in a benevolent manner with your in-laws and do you accept in your hearts the kind of behaviour and goodwill that your husbands should have?॥34-35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)