| श्री महाभारत » पर्व 5: उद्योग पर्व » अध्याय 3: सात्यकिके वीरोचित उद्गार » श्लोक 14-15h |
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| | | | श्लोक 5.3.14-15h  | न हि ते युयुधानस्य संरब्धस्य युयुत्सत:॥ १४॥
वेगं समर्था: संसोढुं वज्रस्येव महीधरा:। | | | | | | अनुवाद | | जैसे बड़े-बड़े पर्वत भी वज्र के वेग को सहन नहीं कर पाते, वैसे ही युद्ध की इच्छा रखने वाले और क्रोध में भरे हुए मुझ सात्यकि के प्रहार को कोई भी सहन नहीं कर सकता। ॥14 1/2॥ | | | | Just as even the biggest mountains are not capable of withstanding the force of a thunderbolt, similarly none of them is capable of withstanding the force of the attack of me, Satyaki, who desires a fight and is filled with anger. ॥14 1/2॥ | | ✨ ai-generated | | |
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