| श्री महाभारत » पर्व 5: उद्योग पर्व » अध्याय 3: सात्यकिके वीरोचित उद्गार » श्लोक 1 |
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| | | | श्लोक 5.3.1  | सात्यकिरुवाच
यादृश: पुरुषस्यात्मा तादृशं सम्प्रभाषते।
यथारूपोऽन्तरात्मा ते तथारूपं प्रभाषसे॥ १॥ | | | | | | अनुवाद | | सात्यकि बोले - बलरामजी! मनुष्य के हृदय में जो कुछ होता है, वही बात उसके मुख से निकलती है। जो तुम्हारा अन्तःकरण है, वही तुम वाणी कह रहे हो॥1॥ | | | | Satyaki said - Balaramaji! Whatever is in a man's heart, the same thing comes out of his mouth. Whatever is your conscience, you are giving the same speech.॥ 1॥ | | ✨ ai-generated | | |
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