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mahabharat 5.29.33: चोर चाहे छिपकर धन चुराए, चाहे खुलेआम लूटे, दोनों ही अवस्थाओं में वे चोर-लुटेरे निन्दा के पात्र हैं। संजय! तुम मुझे बताओ, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन और उन चोर-लुटेरों में क्या अन्तर है?॥ 33॥   |   mahabharat अध्याय 5.29: संजयकी बातोंका प्रत्युत्तर देते हुए श्रीकृष्णका उसे धृतराष्ट्रके लिये चेतावनी देना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 29: संजयकी बातोंका प्रत्युत्तर देते हुए श्रीकृष्णका उसे धृतराष्ट्रके लिये चेतावनी देना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.29.33 
स्तेनो हरेद् यत्र धनं ह्यदृष्ट:
प्रसह्य वा यत्र हरेत दृष्ट:।
उभौ गर्ह्यौ भवत: संजयैतौ
किं वै पृथक्त्वं धृतराष्ट्रस्य पुत्रे॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
चोर चाहे छिपकर धन चुराए, चाहे खुलेआम लूटे, दोनों ही अवस्थाओं में वे चोर-लुटेरे निन्दा के पात्र हैं। संजय! तुम मुझे बताओ, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन और उन चोर-लुटेरों में क्या अन्तर है?॥ 33॥
 
Whether a thief steals money by hiding or robs openly, in both the cases those thieves and robbers deserve condemnation. Sanjay! You tell me, what is the difference between Dhritarashtra's son Duryodhan and those thieves and robbers?॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)