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mahabharat 5.29.2: सूत! मैं भी सदैव यही चाहता हूँ कि दोनों पक्षों में शांति बनी रहे। 'कुन्तीकुमार! कौरवों के साथ संधि कर लो, उनके प्रति शान्त रहो,' ऐसा कहकर मैं पाण्डवों से और कुछ नहीं कहता। राजा युधिष्ठिर के मुख से मैं ऐसे मधुर वचन सुनता हूँ और स्वयं भी इसे उचित मानता हूँ॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 5.29: संजयकी बातोंका प्रत्युत्तर देते हुए श्रीकृष्णका उसे धृतराष्ट्रके लिये चेतावनी देना   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 29: संजयकी बातोंका प्रत्युत्तर देते हुए श्रीकृष्णका उसे धृतराष्ट्रके लिये चेतावनी देना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.29.2 
कामो हि मे संजय नित्यमेव
नान्यद् ब्रूयां तान् प्रति शाम्यतेति।
राज्ञश्च हि प्रियमेतच्छृणोमि
मन्ये चैतत् पाण्डवानां समक्षम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
सूत! मैं भी सदैव यही चाहता हूँ कि दोनों पक्षों में शांति बनी रहे। 'कुन्तीकुमार! कौरवों के साथ संधि कर लो, उनके प्रति शान्त रहो,' ऐसा कहकर मैं पाण्डवों से और कुछ नहीं कहता। राजा युधिष्ठिर के मुख से मैं ऐसे मधुर वचन सुनता हूँ और स्वयं भी इसे उचित मानता हूँ॥ 2॥
 
Suta! I also always wish that there should be peace between both the sides. 'Kuntikumar! Make a treaty with the Kauravas, remain calm towards them,' I do not say anything else to the Pandavas. I hear such sweet words from the mouth of King Yudhishthira and I myself also consider this to be correct.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)