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mahabharat 5.28.1: युधिष्ठिर बोले, "संजय! धर्म सब प्रकार के कर्मों में श्रेष्ठ है। तुमने जो कहा है, वह बिलकुल ठीक है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है; परन्तु पहले यह अच्छी तरह जान लो कि मैं धर्म कर रहा हूँ या अधर्म; फिर मेरी निन्दा करो।"   |   mahabharat अध्याय 5.28: संजयको युधिष्ठिरका उत्तर   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 28: संजयको युधिष्ठिरका उत्तर  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  5.28.1 
युधिष्ठिर उवाच
असंशयं संजय सत्यमेतद्
धर्मो वर: कर्मणां यत् त्वमात्थ।
ज्ञात्वा तु मां संजय गर्हयेस्त्वं
यदि धर्मं यद्यधर्मं चरेयम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "संजय! धर्म सब प्रकार के कर्मों में श्रेष्ठ है। तुमने जो कहा है, वह बिलकुल ठीक है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है; परन्तु पहले यह अच्छी तरह जान लो कि मैं धर्म कर रहा हूँ या अधर्म; फिर मेरी निन्दा करो।"
 
Yudhishthira said, "Sanjaya! Dharma is the best among all types of deeds. What you have said is absolutely correct. There is not the slightest doubt in this; but first find out well whether I am doing Dharma or Adharma; then criticize me."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)