Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 5.27.8: जो मनुष्य योगयुक्त कर्म नहीं करता, वह निरन्तर भोगों और प्रिय (पुत्र आदि) का उपभोग करता हुआ, धन के क्षीण हो जाने पर सुख से वंचित हो जाता है, विषय-वासनाओं से अत्यन्त व्याकुल हो जाता है और सदा दुःख की शय्या पर सोता है॥8॥ | mahabharat अध्याय 5.27: संजयका युधिष्ठिरको युद्धमें दोषकी सम्भावना बतलाकर उन्हें युद्धसे उपरत करनेका प्रयत्न करना । mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
सुखप्रिये सेवमानोऽतिवेलं
योगाभ्यासे यो न करोति कर्म।
वित्तक्षये हीनसुखोऽतिवेलं
दु:खं शेते कामवेगप्रणुन्न:॥ ८॥
अनुवाद
जो मनुष्य योगयुक्त कर्म नहीं करता, वह निरन्तर भोगों और प्रिय (पुत्र आदि) का उपभोग करता हुआ, धन के क्षीण हो जाने पर सुख से वंचित हो जाता है, विषय-वासनाओं से अत्यन्त व्याकुल हो जाता है और सदा दुःख की शय्या पर सोता है॥8॥
The person who does not do the work useful in yoga, while constantly consuming pleasures and his beloved (sons etc.), becomes deprived of happiness when his wealth gets depleted, gets extremely disturbed by sexual desires and always sleeps on the bed of sorrow. 8॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥